Old age home
# वृद्ध आश्रम #अपना घर #old age home यह कुछ ऐसे शब्द है जब इनको सुनता हूं तो यह कवि-हृदय अंदर तक दहल उठता है और बरबस मेरा मन रोने लगता है वाह रे आधुनिकता ! सचमुच इस दुनिया ने कितनी ज्यादा तरक्की कर ली खासकर मेरे हिंदुस्तान ने इस आधुनिकता की इस खोखली चकाचौंध में अपने संस्कार अपनी सभ्यता की आंख मूंदकर होली जला दी जिन माता पिता ने बड़े अरमानों के साथ अपने बच्चों की परवरिश की चाहे खुद भुखे सोए, चाहे खुद ने फटे कपड़े पहने, चाहे खुद नंगे पैर सर्दी गर्मी बरसात को झेला पर कभी भी अपने बच्चों को भूखा नहीं सोने दिया अच्छे से अच्छे कपड़े दिलाएं महंगे से महंगे जूते ला कर दिए और तो और महंगी से महंगी स्कूल में पढ़ाया चाहे कितना ही कर्ज अपने सर ढोना पड़ा चाहे उनके सामर्थ में था या नहीं था लेकिन सिर्फ इतना सा अरमान पाला कि बच्चे अच्छे पढ़ लिखकर कामयाब हो जाएं और हमें वृद्ध अवस्था में अच्छे से संभाल सके लेकिन, लेकिन हम पढ़े भी हम बढे भी हमने खूब सारी तरक्की भी की ...